(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Mahabharata - कर्णपर्व


॥ श्रीः ॥
8.13. अध्यायः 013
Mahabharata - Karna Parva - Chapter Topics
शल्येन श्रुतकीर्तिपराजयः॥


Mahabharata - Karna Parva - Chapter Text

`सञ्जय उवाच। 8-13-0x(4861)(55527)
श्रुतकीर्तिमथायान्तं किरन्तं निशिताञ्शरान्।
मद्रराजो महाराज वारयामास हृष्टवत्॥ 8-13-1(55528)
मद्रराजं समासाद्य श्रुतकीर्तिर्महारथः।
विव्याध भल्लैर्विशत्या कार्तस्वरविभूषितैः॥ 8-13-2(55529)
प्रतिविव्याध तं शल्यं त्रिभिस्तूर्णमजिह्मगैः।
सारथिं चास्य भल्लेन भृशं विव्याध भारत॥ 8-13-3(55530)
स शल्यं शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे।
मुमोच निशितान्बाणान्मद्रराजरथं प्रति॥ 8-13-4(55531)
ततः शल्यो महाराज श्रुतकीर्तिभुजच्युतान्।
चिच्छेद समरे बाणासन्बणैः सन्नतपर्वभिः॥ 8-13-5(55532)
श्रुतकीर्तिस्ततः श्ल्यं भित्त्वा नवभिरायसैः।
सारथिं त्रिभिरानर्च्छत्पुनः शल्यं च प़ञ्चभिः॥ 8-13-6(55533)
तस्य शल्यो धनुश्छित्त्वा हस्तावापं निकृत्य च।
विव्याध समरे तूर्णं सप्तभिस्तं शरोत्तमैः॥ 8-13-7(55534)
अथान्यद्धनुरादाय श्रुतकीर्तिर्महारथः।
भद्रेश्वरं चतुःषष्ट्या बाह्वोरुरसि चार्पयत्॥ 8-13-8(55535)
ततस्तु समरे राजंस्तेन विद्वः शिलीमुखैः।
xxविव्याध तं चापि नवत्या निशितैः शरैः॥ 8-13-9(55536)
तस्य मद्रेश्वरश्चापं पुनश्चिच्छेद मारिष।
स च्छिन्नधन्वा समरे गदां चिक्षेप सत्वरः॥ 8-13-10(55537)
पट्टैर्जाम्बूनदैर्बद्धां रुप्यपट्टैश्च भारत।
भ्राजमानां यथा नारीं दिव्यवस्त्रविभूषिताम्॥ 8-13-11(55538)
तामापतन्तीं सहसा दीप्यमानाशनिप्रभाम्।
शरैरनेकसाहस्रैर्व्यष्टम्भयत मद्रराट्॥ 8-13-12(55539)
विष्टभ्य च गदां वीरः पातयित्वा च भूतले।
श्रुकीर्तिमथायत्तो राजन्विव्याध पञ्चभिः॥ 8-13-13(55540)
तस्य शक्तिं रमे भूयश्चिक्षेप भुजोपमाम्।
तां द्विधा चाछिनच्छल्यो मेदिन्यां सा त्वशीर्यत॥ 8-13-14(55541)
तस्य शल्यः क्षुरप्रेण यन्तुः कायाच्छिरोऽहरत्।
बालहस्ताद्यथा श्येन आमिषं वै नरोत्तम॥ 8-13-15(55542)
स पपात रथोपस्थात्सारथिस्तस्य भारत।
ततस्ते प्राद्रवन्सङ्ख्ये हय्नास्तस्य महात्मनः॥ 8-13-16(55543)
पलायमानैस्तैरश्वैः सोपनीतो रमाजिरात्।
श्रुतकीर्तिर्महाराज पश्यतां सर्वयोधिनाम्॥ 8-13-17(55544)
ततो मद्रेश्वरो राजा पाण्डवानामनीकिनीम्।
व्यगाहत मुदा युक्तो नलिनीं द्विरदो यथा॥ 8-13-18(55545)
लोलयामास स बलं सिंहः पशुगणानिव।
शल्यस्तत्र महारङ्गे पाण्डवानां महात्मनाम्॥ 8-13-19(55546)
निपात्य पाण्डुपाञ्चालान्पृतनासु व्यवस्थितः।
अशोभत रणे शल्यो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन्॥ 8-13-20(55547)
सेनाकक्षं महद्दग्ध्वा कक्षमग्निरिवोत्थितः।
स्थितो रराज समरे पुरं दग्ध्वेव शङ्करः॥ ॥ 8-13-21(55548)

इति श्रीमन्महाभारते कर्णपर्वणि षोडशदिवसयुद्धे त्रयोदशोऽध्यायः॥ 13 ॥


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